आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद राघव चड्ढा ने हाल ही में पंचायत चुनावों और स्थानीय प्रशासन में प्रचलित 'सरपंच पति' प्रथा पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस प्रथा में अक्सर महिला सरपंच के पीछे उनके पति प्रभावी निर्णय लेने वाले रूप में सक्रिय रहते हैं, जिससे महिला प्रतिनिधियों की वास्तविक सत्ता और स्वायत्तता प्रभावित होती है।
चड्ढा ने कहा, "यदि पंचायतों में महिलाओं को सिर्फ नाम मात्र का प्रतिनिधित्व दिया जाता है और उनके पति या पुरुष सदस्य वास्तविक सत्ता का उपयोग कर रहे हैं, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। महिलाओं को उनके अधिकार और निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।"
सांसद ने बताया कि यह समस्या न केवल महिलाओं के नेतृत्व को कमजोर करती है बल्कि स्थानीय प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता और जवाबदेही को भी प्रभावित करती है। उन्होंने केंद्र और राज्यों से आग्रह किया कि वे इस प्रथा पर ध्यान दें और इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाएं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि 'सरपंच पति' प्रथा का मुख्य कारण सामाजिक और सांस्कृतिक रूढ़िवाद है, जिसमें महिलाओं की सार्वजनिक और राजनीतिक भागीदारी को सीमित किया जाता है। इसके चलते पंचायतों में महिला प्रतिनिधियों की क्षमता और नेतृत्व की असली छवि जनता तक नहीं पहुंच पाती।
राघव चड्ढा ने इस मुद्दे को संसद में उठाने का भी संकेत दिया और कहा कि महिला सशक्तिकरण और पंचायत लोकतंत्र की मजबूती के लिए इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
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