पुलिस कार्यप्रणाली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर जहां कानून-व्यवस्था एजेंसियां इसे दक्षता बढ़ाने का साधन बता रही हैं, वहीं विशेषज्ञ इसके संभावित खतरों को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं। सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रताओं पर असर और जरूरत से ज्यादा निगरानी जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में हैं।
पिछले महीने दिल्ली पुलिस ने ‘सेफ सिटी प्रोजेक्ट’ के तहत राष्ट्रीय राजधानी में 10,000 एआई-सक्षम कैमरे लगाने की घोषणा की थी। इन कैमरों में फेस रिकग्निशन सिस्टम और संकट पहचानने वाली तकनीकें शामिल होंगी, जो आपात स्थितियों से जुड़े आवाज़ों और चेहरे के हाव-भाव को पहचानने में सक्षम होंगी। पुलिस का दावा है कि इससे अपराध रोकने और त्वरित प्रतिक्रिया देने में मदद मिलेगी।
इससे कुछ ही दिन पहले महाराष्ट्र सरकार ने राज्य पुलिस के लिए एआई आधारित जांच मंच ‘महा क्राइम ओएस एआई’ शुरू किया था। इस सॉफ्टवेयर का उद्देश्य शिकायतों के निपटारे को तेज करना, जटिल आंकड़ों का विश्लेषण करना और जांच प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाना है। सरकार का कहना है कि इससे पुलिस बल पर काम का दबाव कम होगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा।
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हाल के वर्षों में ये केवल दो उदाहरण हैं, जब एआई आधारित पहलें पुलिसिंग का हिस्सा बनी हैं। हालांकि, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि इस तरह की प्रणालियां पारदर्शिता की कमी, डेटा की गोपनीयता, गलत पहचान और भेदभाव जैसे जोखिम पैदा कर सकती हैं।
आलोचकों का मानना है कि यदि एआई के इस्तेमाल पर स्पष्ट नियम, जवाबदेही और स्वतंत्र निगरानी तंत्र नहीं बनाए गए, तो यह तकनीक नागरिकों की निजता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए विशेषज्ञ पुलिसिंग में एआई के संतुलित, जवाबदेह और कानून-आधारित उपयोग की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।
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