समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश तेज कर दी है। 5 अगस्त को लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में अखिलेश ने कहा कि पीडीए में ‘पी’ का मतलब ‘पंडित’ भी है। इससे पहले 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पीडीए में ‘पी’ को ‘पिछड़ा’ बताया था।
अखिलेश का यह बदलाव महज शब्दों का खेल नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की जातीय और चुनावी राजनीति को ध्यान में रखकर उठाया गया रणनीतिक कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, राज्य की 115 से अधिक विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।
ब्राह्मण वोट पर सभी दलों की नजर
2007 में बहुजन समाज पार्टी ने 403 में से 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़ों के मुताबिक, उस चुनाव में बसपा को करीब 16 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिला था। वहीं भाजपा को 44 प्रतिशत ब्राह्मण मत मिले थे।
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2012 में समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर बसपा को सत्ता से बाहर किया। इस चुनाव में सपा को 19 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिला, जबकि भाजपा को 38 प्रतिशत और बसपा को भी 19 प्रतिशत मत मिले।
इसके बाद 2017 और 2022 में ब्राह्मण वोट बड़े पैमाने पर भाजपा के पक्ष में चला गया। 2017 में भाजपा को करीब 83 प्रतिशत और 2022 में लगभग 89 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिला। सपा को क्रमशः सात और छह प्रतिशत वोट ही हासिल हुआ।
भाजपा और बसपा भी सक्रिय
अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर ब्राह्मण समुदाय को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। हालांकि, भाजपा ने भी समुदाय को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश शुरू कर दी है।
बसपा प्रमुख मायावती भी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ के पुराने फार्मूले को दोहराने की तैयारी में हैं। पार्टी ने सतीश चंद्र मिश्रा को प्रमुख जिम्मेदारियां दी हैं। वहीं भाजपा ने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं तक पहुंच के लिए नागेंद्र नाथ त्रिपाठी को राष्ट्रीय संगठनात्मक जिम्मेदारी सौंपी है।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव फरवरी या मार्च 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे में ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर सपा, भाजपा और बसपा की रणनीति आने वाले महीनों में और तेज होने की संभावना है।
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