देश में संरक्षित स्मारकों के संरक्षण की जिम्मेदारी को लेकर एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब तक यह कार्य केवल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन था, लेकिन अगले दो हफ्तों के भीतर निजी क्षेत्र को भी इस प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी। इसके तहत कॉरपोरेट दानदाता और निजी संस्थान सीधे संरक्षण एजेंसियों और संरक्षण वास्तुकारों (कंजर्वेशन आर्किटेक्ट्स) को नियुक्त कर सकेंगे।
सूत्रों के अनुसार, संस्कृति मंत्रालय इस समय संरक्षण वास्तुकारों और एजेंसियों को सूचीबद्ध (एम्पैनल) करने की प्रक्रिया में जुटा हुआ है। देशभर से विरासत संरक्षण के क्षेत्र में अनुभव रखने वाली 20 से अधिक निजी एजेंसियों ने मंत्रालय द्वारा जारी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) के तहत आवेदन किया है। एक बार मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद, निजी दानदाता इन एजेंसियों से सीधे संपर्क कर सकेंगे।
इस फैसले के बाद एएसआई की अब तक की एकाधिकार भूमिका समाप्त हो जाएगी। हालांकि, एएसआई की तकनीकी विशेषज्ञता और निगरानी की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन संरक्षण कार्यों में अब निजी क्षेत्र की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी। सरकार का मानना है कि इससे ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण में अतिरिक्त संसाधन, विशेषज्ञता और आधुनिक तकनीकों का उपयोग संभव हो सकेगा।
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संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य विरासत संरक्षण को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाना है। निजी भागीदारी से न केवल वित्तीय सहायता बढ़ेगी, बल्कि स्मारकों के संरक्षण और रखरखाव में गुणवत्ता भी सुधरेगी। इसके साथ ही, यह कदम सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल को बढ़ावा देने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने इस फैसले को लेकर चिंता भी जताई है। उनका कहना है कि निजी एजेंसियों की भागीदारी के साथ यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि संरक्षण कार्य ऐतिहासिक और पुरातात्विक मानकों के अनुसार ही हों और व्यावसायिक हितों के कारण स्मारकों की मूल संरचना या विरासत से कोई समझौता न किया जाए।
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