दिल्ली उच्च न्यायालय ने 18 अप्रैल को एक दृष्टिहीन अंतरधार्मिक जोड़े को एक साथ रहने की अनुमति दे दी। यह जोड़ा पूरी तरह से दृष्टिहीन है, और कोर्ट ने महिला से बातचीत के बाद यह निर्णय लिया। महिला ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह याचिकाकर्ता के साथ रहना चाहती है और उससे शादी करने की इच्छा व्यक्त की थी।
कोर्ट ने इस मामले में महिला की इच्छाओं को प्राथमिकता दी और यह माना कि उसके जीवन साथी के साथ रहने का अधिकार है, चाहे वह अंतरधार्मिक संबंध हो या नहीं। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि इस जोड़े को सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि कोई भी बाहरी दखल न हो सके और उनका जीवन सुरक्षित रहे। इसके तहत पुलिस सुरक्षा का भी आदेश दिया गया, ताकि इस जोड़े को किसी भी तरह का उत्पीड़न या खतरा न हो।
महिला की इच्छा को कोर्ट ने सही ठहराया, और कहा कि यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट का यह निर्णय समाज में अंतरधार्मिक विवाह को लेकर जागरूकता और सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाला कदम माना जा रहा है। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि संविधान के तहत हर व्यक्ति को अपनी पसंद के जीवन साथी के साथ रहने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म से संबंधित हो।
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