हाल ही में इबोला के प्रकोप को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ी है, लेकिन सोशल मीडिया पर फैल रही गलत जानकारी के कारण लोग इसे कोविड-19 महामारी से जोड़कर देख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों बीमारियां पूरी तरह अलग हैं और इनके बीच कोई संबंध नहीं है।
मुंबई स्थित ज़ायनोवा शाल्बी अस्पताल की कंसल्टिंग फिजीशियन डॉ. मनीषा भट्ट ने स्पष्ट किया कि इबोला और कोविड-19 के बीच कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि लोगों को अफवाहों पर ध्यान देने के बजाय केवल प्रमाणित चिकित्सा जानकारी पर भरोसा करना चाहिए। उनके अनुसार समय पर जागरूकता और सही जानकारी से अनावश्यक डर को रोका जा सकता है।
डॉ. भट्ट ने बताया कि इबोला वायरस मुख्य रूप से संक्रमित जानवरों जैसे फल खाने वाले चमगादड़, चिंपांज़ी, गोरिल्ला और बंदरों से फैलता है। इन जानवरों के खून, अंगों या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में आने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
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उन्होंने यह भी बताया कि यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून या शरीर के तरल पदार्थ के सीधे संपर्क से भी फैल सकता है। इसके अलावा संक्रमित वस्तुओं को छूना, बिना सुरक्षा के मरीजों की देखभाल करना और असुरक्षित अंतिम संस्कार प्रक्रियाएं भी संक्रमण का कारण बन सकती हैं।
डॉक्टर ने बताया कि इबोला के लक्षणों में बुखार, थकान, सिरदर्द, उल्टी, पेट दर्द और त्वचा पर दाने शामिल हो सकते हैं। शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल संक्रमण जैसे लग सकते हैं, जिससे पहचान में देरी हो सकती है।
उन्होंने कहा कि किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, खासकर यदि व्यक्ति किसी उच्च जोखिम वाले क्षेत्र से यात्रा करके आया हो।
डॉ. भट्ट ने कहा कि साफ-सफाई, संक्रमित व्यक्तियों से दूरी और समय पर इलाज बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि मरीजों को अलग स्वास्थ्य केंद्रों में आइसोलेट करना चाहिए ताकि संक्रमण न फैले।
विशेषज्ञों के अनुसार घबराहट नहीं बल्कि सही जानकारी और सावधानी ही इस बीमारी से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है।
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