भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मंगलवार (6 जनवरी, 2026) को सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन–SIR) का जोरदार बचाव किया। आयोग ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि वह SIR के जरिए “समानांतर” राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) चला रहा है। ईसीआई ने इसे केवल “राजनीतिक बयानबाज़ी” और “वक्रपटुता” करार दिया।
निर्वाचन आयोग की ओर से दलील दी गई कि संविधान के तहत न केवल उसे यह अधिकार प्राप्त है, बल्कि यह उसका संवैधानिक कर्तव्य भी है कि देश की मतदाता सूचियों में यथासंभव कोई भी विदेशी नागरिक शामिल न रहे। आयोग ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए स्वच्छ और सही मतदाता सूची अनिवार्य है।
ईसीआई ने स्पष्ट किया कि SIR और NRC की तुलना पूरी तरह भ्रामक है। आयोग के अनुसार, NRC में सभी नागरिकों का पंजीकरण किया जाता है, जबकि मतदाता सूची केवल उन्हीं लोगों की होती है जो 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के हों, मानसिक रूप से स्वस्थ हों और मतदान के पात्र हों। इस आधार पर SIR को NRC का “समानांतर संस्करण” बताना तथ्यात्मक रूप से गलत है।
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निर्वाचन आयोग ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 और 327 के तहत उसे चुनावी प्रक्रिया, जिसमें मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन शामिल है, पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है। इन संवैधानिक प्रावधानों के तहत आयोग को नागरिकता की जांच करने और अपात्र व्यक्तियों को मतदाता सूची से हटाने का अधिकार है।
ईसीआई ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को भी खारिज किया कि केवल केंद्र सरकार को ही नागरिकता से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार है। आयोग ने कहा कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों में उसकी भूमिका स्वतंत्र और संवैधानिक है, और इसका उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना है।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले की आगे की सुनवाई करेगा, जिसमें SIR की वैधता और निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्तियों पर विस्तृत बहस होने की संभावना है।
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