सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी, 2026) को बिहार में शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन– SIR) अभ्यास की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। यह पुनरीक्षण प्रक्रिया राज्य में मतदाता सूची से जुड़ी है और इसे लेकर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अधिवक्ता नेहा राठी ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग ने मनमाने ढंग से ऐसे अधिकार अपने हाथ में ले लिए हैं, जिनके तहत वह “नागरिकता निर्धारित करने” की भूमिका निभा रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग का चुनाव संचालन और नियंत्रण का अधिकार उसे नागरिकता पर फैसला सुनाने की खुली छूट नहीं देता। उन्होंने कहा कि आयोग ने संसद द्वारा बनाए गए कानूनों, नियमों और यहां तक कि अपने ही मैनुअल में तय सीमाओं को दरकिनार कर दिया है, और इसके लिए कोई ठोस या उचित कारण भी नहीं बताया गया।
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अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि नागरिकता का निर्धारण एक संवेदनशील और संवैधानिक विषय है, जो स्पष्ट रूप से अन्य वैधानिक प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसे चुनावी प्रक्रिया के नाम पर निर्वाचन आयोग द्वारा अपने हाथ में लेना न केवल कानून के दायरे से बाहर है, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे के लिए भी खतरनाक हो सकता है।
याचिकाओं में यह आशंका भी जताई गई कि SIR अभ्यास के जरिए बड़ी संख्या में वास्तविक नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं, जिससे उनके मतदान अधिकार प्रभावित होंगे। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला देशभर में चुनावी प्रक्रियाओं और मतदाता अधिकारों के भविष्य पर दूरगामी असर डाल सकता है।
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