भारत में इस साल चीनी की कीमतें और बढ़ने की आशंका है। अल नीनो के मजबूत होने और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य में सूखे की स्थिति ने गन्ने की पैदावार को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2026 में बारिश की भारी कमी से गन्ने में सुक्रोज की मात्रा घट सकती है। इससे चीनी उत्पादन और उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है।
डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो के मुताबिक, अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है और फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की लगभग 100 प्रतिशत संभावना है। उन्होंने संकेत दिया कि यह 1950 के बाद के सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाक्रमों में से एक हो सकता है।
सूखे और पानी की कमी का असर चीनी मिलों पर भी पड़ सकता है। वर्ष 2027 की शुरुआत में गन्ने की कम पैदावार और चीनी की कम रिकवरी के कारण मिलों के संचालन में कठिनाइयां आने की आशंका है।
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एक साल में चीनी 18.8 प्रतिशत महंगी
उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 8 अक्टूबर 2021 को खुदरा चीनी की कीमत 42.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी। यह कीमत 8 अक्टूबर 2025 तक बढ़कर 46.49 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंची। वहीं, 8 अक्टूबर 2026 को चीनी का खुदरा भाव 55.21 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया। इस तरह एक साल में कीमतों में 18.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
सरकार के अनुसार, चीनी महंगी होने के पीछे कई कारण हैं। प्रतिकूल मौसम से प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में गन्ने की फसल प्रभावित हुई है। त्योहारों के मौसम में मांग बढ़ने और वैश्विक बाजार में आपूर्ति सीमित होने से भी कीमतों पर दबाव पड़ा है। इसके अलावा, व्यापार के कुछ वर्गों द्वारा जमाखोरी और सट्टेबाजी को भी कीमतें बढ़ने का कारण बताया गया है।
किसानों और इथेनॉल कार्यक्रम पर असर
भारत का चीनी उद्योग लगभग पांच करोड़ गन्ना किसानों की आजीविका से जुड़ा है। इससे चीनी मिलों और संबंधित उद्योगों में करीब पांच लाख लोगों को रोजगार मिलता है। उत्पादन घटने से किसानों की आय, मिलों के संचालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
चीनी उद्योग भारत के इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हर साल चीनी उत्पादन का एक हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होता है।
फिलहाल भारत में चीनी की तत्काल कमी की स्थिति नहीं है और मौजूदा भंडार से घरेलू मांग पूरी होने की उम्मीद है। हालांकि, आने वाले महीनों में बारिश और गन्ने की पैदावार की स्थिति तय करेगी कि कीमतों में मौजूदा उछाल अस्थायी रहेगा या महंगाई लंबे समय तक बनी रहेगी।
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