महाराष्ट्र के गड़चिरोली को इस साल की शुरुआत में ‘नक्सल मुक्त’ घोषित किए जाने के बाद सी-60 कमांडो बल की प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, इस विशेष बल की स्थापना करने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी कृष्णिपाल रघुवंशी का मानना है कि सी-60 को भंग नहीं किया जाना चाहिए।
रघुवंशी ने दिसंबर 1990 में गड़चिरोली के पुलिस अधीक्षक रहते हुए सी-60 कमांडो बल की स्थापना की थी। उस समय जिले में माओवादी गतिविधियां चरम पर थीं। पुलिस और सरकारी कर्मचारियों की हत्याएं आम थीं। माओवादी स्थानीय आदिवासियों की भर्ती करते थे और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाते थे, जिससे सुरक्षा बलों के लिए उन्हें नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण था।
रघुवंशी ने माओवादियों की रणनीति का मुकाबला उन्हीं के तरीके से करने का फैसला किया। उन्होंने स्थानीय आदिवासी समुदाय के युवा पुरुषों और महिलाओं को शामिल कर कमांडो बल तैयार किया। इन्हें जंगल में लड़ाई के लिए आंध्र प्रदेश की ग्रेहाउंड्स इकाई ने प्रशिक्षण दिया।
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शुरुआत में सी-60 में 60 ऑन-कॉल कमांडो थे। समय के साथ यह बल बढ़कर 29 टीमों और 961 जवानों वाला संगठन बन गया। इसकी कार्रवाई के दौरान 363 माओवादियों को मार गिराने और 558 को गिरफ्तार करने का दावा किया गया है। इसके अलावा 861 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया।
इस साल मल्लोजुला राव उर्फ भूपति, यमुनक्का, तारक्का और मधु वेल्डा जैसे प्रमुख माओवादी नेताओं और कैडरों के आत्मसमर्पण को महाराष्ट्र में माओवादी आंदोलन के प्रभाव के अंत की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया।
नक्सल विरोधी अभियान में भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। इस संघर्ष में 244 पुलिसकर्मियों और 609 नागरिकों की जान गई।
हाल ही में महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक सदानंद दाते ने नक्सलवाद के खिलाफ अभियान में योगदान देने वाले रघुवंशी और अन्य पुलिसकर्मियों को सम्मानित किया। यह कार्यक्रम ‘ट्रबलशूटर- द अनटोल्ड एनकाउंटर्स ऑफ आईपीएस ऑफिसर केपी रघुवंशी’ नामक पुस्तक के विमोचन के बाद आयोजित किया गया था।
रघुवंशी का कहना है कि सी-60 को सक्रिय रखा जाना चाहिए, क्योंकि कुछ लोग अब भी नक्सली विचारधारा में विश्वास कर सकते हैं और हिंसा दोबारा उभरने की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सेवानिवृत्त होकर महानिदेशक पद तक पहुंचे रघुवंशी आज भी सी-60 के जवानों के संपर्क में रहते हैं और अक्सर गड़चिरोली जाते हैं।
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