भारत के पहले व्यक्ति जिन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की कानूनी अनुमति मिली थी, हरीश राणा का निधन हो गया है। हरीश राणा गंभीर रूप से बीमार थे और लंबे समय तक इलाज के बावजूद उनकी हालत स्थिर नहीं हो पाई। उन्हें एआईआईएमएस, दिल्ली में इलाज के दौरान जीवन रक्षक उपकरणों से हटाया गया था।
हरीश राणा का मामला भारत में जीवन के अधिकार और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर कानूनी बहस का प्रतीक बन गया था। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को विशेष परिस्थितियों में वैध ठहराया था, जिसके तहत गंभीर रूप से बीमार और असहाय मरीजों को जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने की अनुमति दी जा सकती है। हरीश राणा इस फैसले के बाद इस सुविधा का लाभ लेने वाले पहले व्यक्ति बने।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है कि मरीज के जीवन को बनाए रखने वाले उपकरणों या उपचार को रोक दिया जाए, जिससे प्राकृतिक रूप से मृत्यु संभव हो सके। यह सक्रिय इच्छामृत्यु से अलग है, जिसमें सीधे तौर पर मृत्यु की प्रक्रिया की जाती है।
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हरीश राणा के केस ने पूरे देश में चर्चा और बहस को जन्म दिया। कई मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसे मानवीय दृष्टिकोण से सही ठहराया, जबकि कुछ ने इसके दुरुपयोग की आशंका जताई। उनके निधन के बाद यह विषय फिर से चर्चा में है कि गंभीर रूप से बीमार और असहाय मरीजों को गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार किस हद तक मिलना चाहिए।
हरीश राणा की कहानी केवल एक मरीज की नहीं, बल्कि भारत में कानून, नैतिकता और मानवाधिकारों के बीच संतुलन की दास्तान है।
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