झारखंड में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी पेसा (PESA) के नियमों को अधिसूचित करने के हेमंत सोरेन सरकार के फैसले ने बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा कर दिया है। सरकार ने इसे आदिवासी स्वशासन को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया, लेकिन कुछ ही हफ्तों में यह फैसला बीजेपी और आदिवासी संगठनों दोनों के विरोध का कारण बन गया।
पिछले महीने झारखंड कैबिनेट ने PESA अधिनियम, 1996 के क्रियान्वयन के लिए लंबे समय से लंबित नियमों को मंजूरी दी थी। यह मांग वर्षों से आदिवासी समुदाय द्वारा की जा रही थी। सरकार का दावा था कि इन नियमों से ग्राम सभाओं को सशक्त किया जाएगा और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत होगी। हालांकि, इसके उलट विपक्ष और आदिवासी संगठनों का कहना है कि नए नियम ग्राम सभाओं की शक्तियों को कमजोर करते हैं और राज्य सरकार का नियंत्रण बढ़ाते हैं।
रविवार को आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के खूंटी सांसद अर्जुन मुंडा ने हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने PESA अधिनियम की “आत्मा पर प्रहार” किया है। मुंडा ने अधिसूचित नियमों को 1996 के मूल कानून की “ठंडे दिमाग से की गई हत्या” करार दिया।
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बीजेपी का आरोप है कि नए नियम पंचायत राज व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई ग्राम सभा के अधिकारों को सीमित करते हैं और पारंपरिक आदिवासी स्वशासन की प्रकृति को बदलने की कोशिश करते हैं। पार्टी का कहना है कि PESA कानून का उद्देश्य आदिवासी समुदायों को जल, जंगल और जमीन पर निर्णय लेने का अधिकार देना था, लेकिन नए नियम उस मूल भावना के विपरीत हैं।
वहीं, कई आदिवासी संगठनों ने भी इन नियमों पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इससे स्थानीय स्वायत्तता कमजोर होगी और नौकरशाही का दखल बढ़ेगा। इस तरह, जिस फैसले को सरकार आदिवासी सशक्तिकरण का प्रतीक बता रही थी, वही अब झारखंड की राजनीति में नए टकराव और असंतोष का कारण बन गया है।
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