नेपाल में ग्लेशियर झील टूटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में ऐसी आपदाओं के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच आईआईटी मंडी की एक स्टडी में हिमाचल प्रदेश की कई ग्लेशियर झीलों को लेकर चेतावनी दी गई है। शोध के मुताबिक, करीब 2,000 झीलों और कई ग्लेशियरों के अध्ययन के बाद 9 से 12 झीलों को गंभीर या ‘क्रिटिकल’ स्थिति में पाया गया है।
आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स पी. शुक्ला के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में कई ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल पिछले एक दशक में 30 से 60 प्रतिशत तक बढ़ा है। झीलों के बढ़ते आकार से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ का खतरा बढ़ सकता है।
शुक्ला के मुताबिक, हिमालय में बढ़ता पर्यटन और प्रदूषण भी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह बन रहा है। वाहनों और मानवीय गतिविधियों से निकलने वाली धूल तथा कार्बन ग्लेशियरों पर जमा होकर काली परत बना देते हैं। यह परत सूर्य की ऊर्जा को अधिक अवशोषित करती है, जिससे बर्फ तेजी से पिघलती है।
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उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में मौजूद पर्माफ्रॉस्ट को लेकर भी चिंता जताई। तापमान बढ़ने से इसके पिघलने पर पहाड़ी जमीन अस्थिर हो सकती है और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने हिमाचल प्रदेश में घेपन, वासुकी, काशांग और बास्पा क्षेत्र की एक अन्य झील समेत चार झीलों की पहचान की है, जिन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत बताई गई है। वहीं, आईआईटी मंडी के अध्ययन में 9 से 12 झीलों को गंभीर माना गया है। इनमें घेपन, योचे और काली कुंड को विशेष रूप से चिंताजनक बताया गया है।
नेपाल में 26 अगस्त की आपदा ने इन आशंकाओं को और गंभीर बना दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियर के हिस्से के ल्हेंदे खोला नदी में गिरने और भूस्खलन के बाद बनी कृत्रिम झील के टूटने से पानी भोटेकोशी नदी में पहुंचा, जिससे विनाशकारी बाढ़ आई।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय में विकास और कनेक्टिविटी जरूरी है, लेकिन पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखते हुए इसे नियंत्रित और वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाना बेहद महत्वपूर्ण है।
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