भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति के रुख का समर्थन करते हुए कहा है कि सक्रिय तरलता प्रबंधन ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच ऋण वृद्धि और वित्तीय स्थिरता को मजबूती प्रदान की। सर्वेक्षण में कहा गया कि आरबीआई की समय पर और लचीली नीति प्रतिक्रिया ने बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई, जिससे अर्थव्यवस्था को सहारा मिला।
सर्वेक्षण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि घरेलू वित्तपोषण के नवोन्मेषी और समावेशी माध्यमों को और मज़बूत करने की आवश्यकता है, ताकि वैश्विक पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव के प्रभाव से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके। इसमें कहा गया कि वर्ष भर आरबीआई ने तरलता प्रबंधन में चुस्ती दिखाई और बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित की, जिससे मनी मार्केट और क्रेडिट मार्केट में बेहतर प्रसारण संभव हुआ।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, अधिशेष तरलता की स्थिति में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की ऋण और जमा दरों तक नीति का प्रभाव मजबूत बना रहा। इससे बैंकों को उत्पादक क्षेत्रों की ऋण मांग को पूरा करने में मदद मिली। सर्वेक्षण में मई 2025 में जारी आरबीआई के नए नियामक ढांचे को भी रेखांकित किया गया, जिसे पारदर्शी, परामर्श-आधारित और प्रभाव-केंद्रित नियमन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव बताया गया है। यह ढांचा व्यापक सामाजिक और विकासात्मक लक्ष्यों के साथ मैक्रो-आर्थिक उद्देश्यों के संतुलन को दर्शाता है।
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सर्वेक्षण के मुताबिक, वित्तीय क्षेत्र के नियमन की गुणवत्ता आर्थिक लचीलापन और सतत विकास का एक प्रमुख आधार बनकर उभरी है। मूल्य स्थिरता बनाए रखने, वित्तीय स्थिरता को समर्थन देने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के माध्यम से मौद्रिक नीति दीर्घकालिक आर्थिक विकास में सहायक की भूमिका निभा रही है।
महंगाई के दबाव में कमी आने के बाद आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर में कटौती की और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में कमी तथा खुले बाजार परिचालनों (ओएमओ) के ज़रिये स्थायी तरलता का संचार किया। इन उपायों का उद्देश्य ऋण प्रवाह को बेहतर बनाना, निवेश को बढ़ावा देना और समग्र आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देना था।
सर्वेक्षण में बताया गया कि इन नीतिगत ढीलों का असर उधार दरों में भी दिखा और वर्ष के दौरान अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की भारित औसत ऋण दरों में गिरावट दर्ज की गई। व्यापक मुद्रा वृद्धि 9 प्रतिशत से बढ़कर 12 प्रतिशत से अधिक हो गई, जिससे स्पष्ट है कि बैंकों ने जारी तरलता का प्रभावी उपयोग किया। इसके साथ ही, ओएमओ के माध्यम से अतिरिक्त तरलता जुड़ने से वित्त वर्ष 2026 में औसतन लगभग 1.89 लाख करोड़ रुपये का अधिशेष बना रहा।
सर्वेक्षण ने आरबीआई के तहत एक समर्पित नियामक समीक्षा प्रकोष्ठ के गठन का भी उल्लेख किया, जो हर नियम की पांच से सात वर्षों में समीक्षा करेगा। यह पहल प्रतिक्रियात्मक नीति निर्माण से आगे बढ़कर भविष्य को ध्यान में रखने वाले नियमन की ओर संकेत करती है।
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