भू-राजनीतिक चुनौतियों के मौजूदा दौर में भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र (यूएन) को अब अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले प्रभावी संगठन के रूप में नहीं देखा जाता। भारत के अनुसार, वैश्विक विमर्श अब संयुक्त राष्ट्र से बाहर “समानांतर बहुपक्षीय ढांचों” की ओर बढ़ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत परवथानेनी हरीश ने सोमवार (26 जनवरी 2026) को सुरक्षा परिषद की खुली बहस के दौरान यह बात कही। यह बहस ‘अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन की पुनः पुष्टि: शांति, न्याय और बहुपक्षवाद को सुदृढ़ करने के रास्ते’ विषय पर आयोजित की गई थी।
उन्होंने कहा कि सार्वभौमिक सदस्यता वाला बहुपक्षवाद, जिसके केंद्र में संयुक्त राष्ट्र है, गंभीर दबाव में है। संघर्षों को सुलझाने में संगठन की निष्क्रियता और प्रभावहीनता इसकी बड़ी कमजोरी बनी हुई है।
राजदूत हरीश ने कहा कि दुनिया भर के लोग संयुक्त राष्ट्र को ऐसा मंच नहीं मानते जो वास्तव में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा प्रदान कर सके। इसी कारण कई देश अब यूएन ढांचे से बाहर वैकल्पिक व्यवस्थाओं की ओर देख रहे हैं, जिनमें कुछ निजी क्षेत्र की भागीदारी भी शामिल है।
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भारत का यह बयान ऐसे समय आया है जब संयुक्त राष्ट्र और उसकी सबसे शक्तिशाली संस्था, सुरक्षा परिषद, वैश्विक संघर्षों को रोकने और सुलझाने में लगातार विफल रही है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की शुरुआत की है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन का इस्तेमाल किसी देश की संप्रभुता पर सवाल उठाने या उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए नहीं किया जाना चाहिए। राजदूत हरीश ने कहा कि कानून के शासन में समानता, निष्पक्षता और दोहरे मानदंडों की अनुपस्थिति जरूरी है।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान संरचना बीते दौर की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाती है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में परिषद की स्थायी और अस्थायी सदस्यता का विस्तार अनिवार्य है, ताकि उसकी प्रासंगिकता और प्रभावशीलता बनी रह सके।
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