आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने अमेरिका और चीन के बीच तेज़ होती तकनीकी और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को सतर्क किया है। सर्वेक्षण का कहना है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत अब “पीछे-पीछे चलने” की रणनीति नहीं अपना सकता। उसे अपनी वैश्विक नीति का तुरंत पुनर्मूल्यांकन कर “रणनीतिक अनिवार्यता” (Strategic Indispensability) की दिशा में बढ़ना होगा, वरना वह भविष्य की विश्व व्यवस्था में हाशिए पर जा सकता है।
सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया तेजी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों के इर्द-गिर्द पुनर्गठित हो रही है। इसी संदर्भ में “पैक्स सिलिका” नामक अमेरिकी नेतृत्व वाली पहल का उल्लेख किया गया है, जिसका उद्देश्य AI वैल्यू चेन पर नियंत्रण स्थापित करना है। इसमें ऊर्जा स्रोतों, दुर्लभ खनिजों, चिप निर्माण और सॉफ्टवेयर मॉडल्स पर प्रभुत्व शामिल है। सर्वेक्षण का मानना है कि यह बदलाव तेल और स्टील के युग के अंत और “कंप्यूट” को शक्ति के नए केंद्र के रूप में स्थापित करता है।
अमेरिका ने चीन को उन्नत सेमीकंडक्टर और उनके निर्माण से जुड़ी तकनीक से वंचित करने के लिए सख्त निर्यात नियंत्रण लगाए हैं। इसके जवाब में चीन ने दुर्लभ खनिजों और स्थायी मैग्नेट्स के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं और कई विदेशी कंपनियों को अपनी “अनरिलाएबल एंटिटीज़ लिस्ट” में डाला है। सर्वेक्षण इसे पूर्ण विकसित “रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता” बताता है, जहां दक्षता आधारित व्यापार की जगह राजनीतिक निर्णय ले रहे हैं।
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चीन की आंतरिक अर्थव्यवस्था भी दबाव में है। मंद मांग, डिफ्लेशन और रियल एस्टेट संकट के चलते वह निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग पर अधिक निर्भर हो रहा है। इसके विपरीत, अमेरिका समान विचारधारा वाले देशों के साथ एक विशिष्ट तकनीकी गठबंधन बना रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत को केवल बैक-ऑफिस अर्थव्यवस्था बने रहने के बजाय वैश्विक वैल्यू चेन में ऐसे उत्पाद और सेवाएं विकसित करनी होंगी, जिनका विकल्प आसान न हो। घरेलू नवाचार क्षमता बढ़ाना और विदेशी डिजिटल प्रणालियों पर निर्भरता कम करना समय की मांग है।
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