सऊदी अरब के तुर्की और पाकिस्तान के साथ त्रिपक्षीय रक्षा समझौता करने के फैसले पर ईरान ने तुरंत प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने चेतावनी दी कि केवल कागजी समझौता सऊदी अरब को स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकता। इससे संकेत मिला है कि अमेरिका के साथ जारी संघर्ष के बीच तेहरान रियाद के खिलाफ अपने समर्थित समूहों के हमले जारी रख सकता है।
ईरानी संसद और राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति आयोग के सदस्य इब्राहिम रजई ने कहा कि सऊदी अरब को समझना चाहिए कि तुर्की और पाकिस्तान के साथ किया गया कागजी समझौता उसे सुरक्षा नहीं देगा। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय तक अमेरिका पर एकतरफा निर्भरता भी सऊदी अरब को सुरक्षा नहीं दिला सकी।
सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि नया समझौता रियाद के लिए तेहरान से संभावित खतरे को कम करने की कोशिश है। मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह व्यवस्था अमेरिकी नेतृत्व वाले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की सामूहिक रक्षा व्यवस्था से मिलती-जुलती है।
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विशेषज्ञों के अनुसार, सऊदी अरब अमेरिका पर अपनी रक्षा निर्भरता कम करने और अन्य देशों के साथ सुरक्षा साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया और यमन में हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब को पहले भी हमलों का सामना करना पड़ा है।
क्या सऊदी अरब को परमाणु सुरक्षा मिलेगी? इस सवाल पर सऊदी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि समझौता किसी देश के खिलाफ नहीं है और इसका किसी परमाणु महत्वाकांक्षा या हथियारों की दौड़ से संबंध नहीं है। सऊदी अधिकारी रायद क्रिमली ने कहा कि यह किसी सैन्य धुरी या सांप्रदायिक गुट के गठन की कोशिश नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रक्षा क्षमताएं विकसित करने पर केंद्रित है। तुर्की ने भी कहा कि समझौता किसी विशेष देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है।
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