राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग में कथित असहमति और मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर उठे विवाद पर आयोग से कानूनी कार्रवाई करने को कहा है। उन्होंने कहा कि यदि हालिया रिपोर्ट गलत है तो चुनाव आयोग को मानहानि का मुकदमा दायर करना चाहिए। वहीं, अगर मतदाताओं के नाम हटाने के फैसले केंद्रीकृत तरीके से लिए गए हैं, तो उन्होंने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए ‘देशद्रोह’ तक की बात कही।
सिब्बल ने द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और निर्देशों पर सवाल उठाए थे। चुनाव आयोग ने कहा है कि अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा पिछले एक साल में उसके सभी प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
सिब्बल ने आयोग पर मतदाता डेटा के कथित केंद्रीकरण और फॉर्म-6 के जरिए नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने गोवा के 97 मतदाताओं का भी जिक्र किया, जिन्हें एसआईआर के दौरान सूची से बाहर किए जाने के बाद दोबारा शामिल किए जाने को लेकर विवाद हुआ। आयोग ने बाद में कहा कि इनमें से 81 लोगों को पहले ही मतदाता सूची में शामिल किया जा चुका है।
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उन्होंने पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के मुद्दे पर भी सवाल उठाए और कहा कि आयोग को सभी आरोपों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
इस बीच, चुनाव आयोग ने ईसीआईनेट प्रणाली की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने का फैसला किया है। समिति में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त के साथ आईआईटी या आईआईआईटी का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होगा। आयोग का कहना है कि अधिकारियों को उनकी वैधानिक शक्तियों के अनुसार ईसीआईनेट पर भूमिका-आधारित पहुंच हासिल है।
सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से भी चुनाव आयोग से संबंधित रिकॉर्ड मंगाकर मामले की जांच करने की मांग की। वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने आयोग के स्पष्टीकरण को विवाद समाप्त करने वाला बताया है।
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