मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने वाले 2019 के संशोधन को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने 159 पन्नों के फैसले में कहा कि राज्य की सेवाओं में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत ही रहेगा।
यह संशोधन तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने 8 मार्च 2019 को लागू किया था। इसके खिलाफ याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ओबीसी कोटा बढ़ाने से मध्य प्रदेश में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा पार कर जाएगा। यह सीमा सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी मामले में निर्धारित की थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के अनुसार, अदालत ने सभी दस्तावेजों और दलीलों की समीक्षा के बाद पाया कि ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति या आपात स्थिति मौजूद नहीं थी। इसी आधार पर अदालत ने बढ़े हुए आरक्षण को उचित नहीं माना।
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पुरानी चयन प्रक्रियाओं को राहत
अदालत ने 2 सितंबर 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच 27 प्रतिशत आरक्षण के आधार पर पूरी की गई चयन प्रक्रियाओं को सुरक्षित रखा है। इन चयन प्रक्रियाओं से संबंधित अतिरिक्त पदों को अगले तीन चयन चक्रों में समायोजित करने का निर्देश दिया गया है।
वहीं, रोकी गई 13 प्रतिशत पदों की सूची को अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों से भरने का आदेश दिया गया है। अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई पूरी करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
मध्य प्रदेश में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के तहत अनुसूचित जाति को 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 20 प्रतिशत, ओबीसी को 14 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। ओबीसी कोटा 27 प्रतिशत करने पर कुल आरक्षण 73 प्रतिशत तक पहुंचने का तर्क याचिकाकर्ताओं ने दिया था।
ओबीसी पक्ष के वकील पुष्पेंद्र शाह ने कहा कि अदालत ने समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त मानते हुए 14 प्रतिशत आरक्षण को ही उचित माना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य सरकार ओबीसी आरक्षण के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है।
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