पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ अपनी याचिका पर खुद दलील देते हुए आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल मतदाताओं के नाम हटाने और चुनावी व्यवस्था को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता से रहित है और इससे मतदाताओं में भय का माहौल पैदा हो रहा है।
सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने अदालत से कहा, “बंगाल में SIR सिर्फ वोटर डिलीशन के लिए है, न्याय बंद दरवाजों के पीछे रो रहा है।” उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि उन्हें सीधे अपनी बात रखने के लिए दस मिनट दिए जाएं। हालांकि अदालत ने शुरुआत में कहा कि उनके पास अनुभवी वकीलों की टीम मौजूद है, लेकिन ममता ने खुद अपनी बात रखने पर जोर दिया।
ममता बनर्जी ने अदालत को बताया कि उन्होंने चुनाव आयोग को छह पत्र लिखे, लेकिन किसी का जवाब नहीं मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक निर्वाचित मुख्यमंत्री की बात नहीं सुनी जा रही, तो आम नागरिकों की शिकायतों का क्या होगा। उनके अनुसार, SIR प्रक्रिया को चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने के लिए “हथियार” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और इससे आने वाले चुनावों पर सीधा असर पड़ सकता है।
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उन्होंने कहा कि यह लड़ाई सिर्फ तृणमूल कांग्रेस या बंगाल की नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की है। उन्होंने आरोप लगाया कि गरीब लोग जब स्थान बदलते हैं तो उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाते हैं और आधार के अलावा अतिरिक्त प्रमाणपत्र मांगे जा रहे हैं, जबकि अन्य राज्यों में ऐसा नियम नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि SIR केवल बंगाल में ही क्यों लागू किया जा रहा है, असम में क्यों नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है और विस्तृत जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की गई है। कोर्ट ने पहले भी निर्देश दिया था कि प्रक्रिया पारदर्शी हो और जिन मतदाताओं के नामों में “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” पाई गई है, उनकी सूची सार्वजनिक की जाए।
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