राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने उज्जैन में युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि जेनरेशन जेड के युवा धर्म पर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि धर्म केवल किताबों या भाषणों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे आचरण और कर्तव्यों में दिखाई देना चाहिए।
मोहन भागवत ने अहंकार और घमंड से बचने की सलाह देते हुए कहा कि अहंकार से प्रेरित व्यक्ति मानता है कि हर जगह उसका अधिकार चलता है और सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार होना चाहिए। हालांकि, वास्तविकता इससे अलग है।
उनका यह बयान पड़ोसी शहर इंदौर में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के प्रस्तावित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से एक दिन पहले आया। भागवत ने अपने संबोधन में राहुल गांधी या किसी अन्य राजनीतिक नेता का नाम नहीं लिया।
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भागवत ने कहा कि आज के समय में युवाओं को धर्म पर चर्चा करते देखना कम ही सुनने को मिलता है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर भगवद्गीता और रामायण जैसे ग्रंथों को बुजुर्गों या सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ने वाली चीज माना जाता है, लेकिन धर्म जीवन के आरंभ से अंत तक बना रहता है।
उन्होंने धर्म को पुत्र धर्म, राज धर्म और मानव धर्म जैसे कर्तव्यों से जोड़ते हुए कहा कि यह व्यक्ति और जीवों की प्रकृति के अनुसार उनके कर्तव्य निर्धारित करता है। उनके अनुसार धर्म वह अनुशासन है जो सभी को एकजुट रखता है और भौतिक तथा आध्यात्मिक प्रगति में सहायक होता है।
धार्मिक सहिष्णुता की बात करते हुए भागवत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति और परंपरा के अनुरूप पूजा-पद्धति पर कायम रहना चाहिए। साथ ही दूसरों की पूजा-पद्धतियों का भी सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म का पालन आचरण में होना चाहिए, केवल पुस्तकों और भाषणों में नहीं।
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