राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सोमवार (16 फरवरी 2026) को ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना को मंजूरी दे दी। पर्यावरणीय स्वीकृतियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का निपटारा करते हुए अधिकरण ने परियोजना के “रणनीतिक महत्व” को ध्यान में रखा और कहा कि हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं बनता।
करीब ₹92,000 करोड़ की इस महत्वाकांक्षी परियोजना में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा, टाउनशिप और पावर प्लांट का निर्माण प्रस्तावित है। यह विकास कार्य 160 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में किया जाएगा।
इसमें लगभग 130 वर्ग किलोमीटर वन भूमि शामिल है, जहां निकोबारी और शोम्पेन जनजातियां निवास करती हैं। दोनों ही अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत आती हैं, जबकि शोम्पेन समुदाय को ‘विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह’ (पीवीटीजी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
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परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने जैव विविधता, वन क्षेत्र और आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर चिंता जताई थी। हालांकि, एनजीटी ने कहा कि परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
सरकार का तर्क है कि यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत करेगी और क्षेत्रीय व्यापार व कनेक्टिविटी को बढ़ावा देगी।
एनजीटी के इस निर्णय के बाद परियोजना के कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त हो गया है, हालांकि पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर बहस जारी रहने की संभावना है।
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