प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार शाम दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) में कॉलेज के शताब्दी समारोह में शामिल हुए। यह उनकी उसी संस्थान में 13 साल बाद वापसी है, जहां 2013 में उनके एक भाषण को राष्ट्रीय राजनीति में उनकी बड़ी भूमिका की शुरुआत के तौर पर देखा गया था।
फरवरी 2013 में मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में एसआरसीसी पहुंचे थे। उस समय वह मुख्यमंत्री के तौर पर अपने चौथे कार्यकाल के शुरुआती दौर में थे और भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित नहीं हुए थे। वह अक्टूबर 2001 से गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा का नेतृत्व किया और प्रधानमंत्री बने।
2013 में उनके भाषण का विषय ‘वैश्विक परिदृश्य में उभरते कारोबारी मॉडल’ था, लेकिन उन्होंने केवल कारोबार की बात नहीं की थी। उन्होंने युवाओं, शासन और भारत की संभावनाओं पर भी जोर दिया था। उन्होंने युवाओं को केवल ‘नए दौर के मतदाता’ मानने के बजाय देश की ‘नई शक्ति’ बताया था।
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मोदी ने भारत की युवा आबादी का जिक्र करते हुए कहा था कि देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। उन्होंने इस जनसांख्यिकीय क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने की जरूरत बताई थी।
उनके भाषण में आधे भरे गिलास का उदाहरण भी काफी चर्चित हुआ था। उन्होंने कहा था कि आशावादी व्यक्ति गिलास को आधा भरा और निराशावादी आधा खाली देखता है, जबकि उनका नजरिया अलग है—गिलास आधा पानी और आधा हवा से भरा है।
उन्होंने ताइवान की अपनी पुरानी यात्रा का किस्सा सुनाते हुए भारतीय युवाओं को कंप्यूटर माउस के जरिए दुनिया को प्रभावित करने वाली नई पीढ़ी बताया था। इसी दौरान उनके ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ और ‘सरकार का काम कारोबार करना नहीं है’ जैसे विचार भी चर्चा में आए थे।
इस वर्ष मोदी की यात्रा शिक्षक दिवस के दिन हुई। 2013 में उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को भी रेखांकित करते हुए कहा था कि एक शिक्षक विदेश जाए तो वह पूरी पीढ़ी को प्रभावित करता है। उन्होंने तब कहा था कि 21वीं सदी भारत की सदी हो सकती है।
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