आगामी नगर निकाय चुनावों से पहले पुणे की प्रदूषित नदियां एक बड़े नागरिक मुद्दे के रूप में उभरकर सामने आई हैं। मुठा नदी, जो लंबे समय से अत्यधिक प्रदूषण की मार झेल रही है, से लेकर पावना नदी तक, जो गंदगी और कचरे से लगभग जाम हो चुकी है, शहर की नदियों की बदहाल स्थिति ने मतदाताओं की चिंता बढ़ा दी है।
जैसे-जैसे चुनावी प्रचार तेज हो रहा है, वैसे-वैसे नागरिक केवल नारों और वादों से संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं। लोगों की मांग है कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि नदियों की सफाई और पुनर्जीवन के लिए ठोस और निरंतर कार्रवाई हो। कई नागरिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि वर्षों से सीवेज ट्रीटमेंट की अपर्याप्त व्यवस्था के कारण बिना उपचारित गंदा पानी सीधे नदियों में छोड़ा जा रहा है, जिससे जल प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।
शहरवासियों का मानना है कि पर्याप्त और अधिक प्रभावी सीवेज शोधन संयंत्रों (एसटीपी) की कमी इस समस्या की जड़ है। कई इलाकों में मौजूदा संयंत्र या तो पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं या तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। इसके अलावा, औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू कचरे का नदियों में गिरना भी स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
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स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नदियों का प्रदूषण केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल आपूर्ति और शहर की जीवन गुणवत्ता से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। दूषित जल के कारण बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है और जैव विविधता को भी भारी नुकसान हो रहा है।
मतदाता अब नगर निगम से पारदर्शी योजना, सख्त निगरानी और समयबद्ध क्रियान्वयन की अपेक्षा कर रहे हैं। उनका साफ कहना है कि जो भी नेतृत्व आए, उसे नदी पुनर्जीवन को प्राथमिकता देनी होगी।
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