पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि यदि वैश्विक संकट लंबा चला, तो बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों का बोझ आखिरकार आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
संजय मल्होत्रा ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और स्विस नेशनल बैंक द्वारा आयोजित 12वें उच्च स्तरीय सम्मेलन में कहा कि भारत सरकार ने अब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का काफी दबाव खुद वहन किया है। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बावजूद पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में ज्यादा बदलाव नहीं किया गया है। सरकार ने कुछ शुल्कों में कटौती की है और गैस जैसी नियंत्रित कीमतों में सीमित वृद्धि की अनुमति दी है।
हालांकि, आरबीआई गवर्नर ने चेतावनी दी कि यदि संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो ऐसी राहत उपायों को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष लगभग 75 दिनों से जारी है और समय के साथ बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाला जा सकता है।
और पढ़ें: RBI के नए ऑटो-डेबिट नियम लागू, अब आपके बिल और SIP पर मिलेगा ज्यादा नियंत्रण
मल्होत्रा ने यह भी कहा कि सरकार वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की दिशा में काम कर रही है। कोविड महामारी के दौरान राजकोषीय घाटा जीडीपी के 9.2 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जिसे अब घटाकर लगभग 4.3 प्रतिशत कर दिया गया है।
उन्होंने भारत और मध्य पूर्व के मजबूत आर्थिक संबंधों का भी उल्लेख किया। भारत के लगभग एक-छठे आयात और निर्यात इस क्षेत्र से जुड़े हैं। इसके अलावा, भारत की करीब 40 प्रतिशत विदेशी धनराशि और उर्वरक आयात तथा लगभग 60 प्रतिशत गैस आपूर्ति भी इसी क्षेत्र पर निर्भर है।
और पढ़ें: लेबनान में इज़राइली ड्रोन हमलों से 12 लोगों की मौत, दो बच्चे भी शामिल