भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने बुधवार को अपनी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने अपनी तटस्थ (न्यूट्रल) मौद्रिक नीति का रुख भी बरकरार रखा। यह निर्णय वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने एमपीसी के फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका द्वारा लगाए गए नए शुल्क (टैरिफ) वैश्विक व्यापार के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं। इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है, जिसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
केंद्रीय बैंक ने स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (एसडीएफ) की दर 5 प्रतिशत पर यथावत रखी है। वहीं मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (एमएसएफ) दर और बैंक दर भी 5.5 प्रतिशत पर बरकरार रखी गई हैं।
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यह फैसला बाजार की उम्मीदों के अनुरूप रहा। अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना था कि छह सदस्यीय एमपीसी मौजूदा परिस्थितियों में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगी और अपनी तटस्थ नीति को जारी रखेगी।
आरबीआई ने कहा कि पिछले उच्च स्तरों की तुलना में महंगाई में कमी आई है, लेकिन हाल के महीनों में इसमें कुछ बढ़ोतरी भी देखने को मिली है। महंगाई पर कच्चे तेल की कीमतों, विनिमय दर में उतार-चढ़ाव और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम का प्रभाव बना हुआ है। हालांकि, मुद्रास्फीति अभी भी आरबीआई द्वारा निर्धारित स्वीकार्य दायरे के भीतर है।
घरेलू अर्थव्यवस्था के बारे में केंद्रीय बैंक ने कहा कि मजबूत आर्थिक गतिविधियां, अनुकूल मानसून, बेहतर विकास दर और विदेशी पूंजी निवेश का लगातार प्रवाह भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था लचीलेपन का प्रदर्शन कर रही है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में दबाव के संकेत भी दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि महंगाई और आर्थिक विकास, दोनों को लेकर जोखिम बने हुए हैं, इसलिए सतर्क और संतुलित नीति अपनाना आवश्यक है।
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