विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन—SIR) अभ्यास को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना कोई पूर्ण अधिकार नहीं, बल्कि एक “सशर्त अधिकार” है। आयोग ने कहा कि यह अधिकार संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में तय पात्रता मानकों के अधीन है।
मंगलवार (27 जनवरी, 2026) को सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि एसआईआर का उद्देश्य नागरिकता का निर्धारण करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची में दर्ज विवरणों का सत्यापन करना है। आयोग ने यह भी कहा कि यहां तक कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को भी भारतीय नागरिकता की मूल शर्त को “निरंतर पूरा करना” आवश्यक है, ताकि उनका नाम मतदाता सूची में बना रह सके।
चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 326 का हवाला देते हुए कहा कि यह अनुच्छेद सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है। इसके तहत किसी व्यक्ति को मतदाता के रूप में पंजीकरण का अधिकार तभी मिलता है, जब वह 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का हो, भारत का नागरिक हो और कानून द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।
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आयोग के अनुसार, यदि इन आवश्यक शर्तों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती, तो व्यक्ति का मतदाता सूची में बने रहना स्वतः सुनिश्चित नहीं होता। इसीलिए एसआईआर के तहत समय-समय पर सूची का सत्यापन आवश्यक है, ताकि चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और पारदर्शिता बनी रहे।
ईसीआई ने यह भी दोहराया कि एसआईआर के जरिए किसी की नागरिकता तय नहीं की जा रही है, बल्कि केवल यह देखा जा रहा है कि क्या मतदाता संविधान और कानून में निर्धारित मानकों को पूरा करता है या नहीं। आयोग ने अदालत से कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है और इस दिशा में उठाए गए कदम संविधान सम्मत हैं।
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