सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। अदालत ने सभी हाई कोर्ट को आदेश दिया है कि किसी भी मामले में निर्णय सुरक्षित रखने के तीन महीने के भीतर अनिवार्य रूप से फैसला सुनाया जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि मामलों में देरी से पक्षकारों को गंभीर और अपूरणीय नुकसान होता है। विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तेजी से निर्णय लेना अत्यंत आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिकाओं में यदि आदेश सुरक्षित रखा गया है, तो उसे उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जमानत या सजा निलंबन के आदेशों को तुरंत जेल प्रशासन तक पहुंचाया जाए, ताकि विचाराधीन कैदी या दोषी को उसी दिन या अगले दिन रिहा किया जा सके।
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शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सभी जमानत आदेशों की जानकारी संबंधित जेल अधिकारियों को तत्काल दी जाए, जिससे रिहाई प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी फैसलों को उनके सुनाए जाने के 24 घंटे के भीतर हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जिस दिन फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाया जाता है, वही दिन निर्णय की तिथि माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि देश के हाई कोर्ट न्याय प्रणाली की महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं, जहां हजारों लोग न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं, इसलिए समय पर फैसले सुनाना आवश्यक है।
यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत जारी किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्देश किसी भी न्यायाधीश या संस्था की आलोचना नहीं है, बल्कि न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और तेज बनाने के लिए दिया गया है।
यह आदेश झारखंड हाई कोर्ट में फैसलों में देरी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया गया।
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