सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में आवारा पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र और राज्यों से इस समस्या के समाधान के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल पशुओं के प्रति करुणा व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह करुणा जमीनी स्तर पर प्रभावी व्यवस्थाओं के रूप में दिखाई देनी चाहिए ताकि आम नागरिकों की जान और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें एक व्यक्ति की आवारा सांड के हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बाद मृत्यु हो गई थी। मृतक की पत्नी द्वारा दायर अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये की एकमुश्त मुआवजा राशि देने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि चार सप्ताह के भीतर अदा की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवारा पशुओं की समस्या अब केवल स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा, सड़क दुर्घटनाओं और नागरिकों के जीवन से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है। अदालत ने कहा कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में आवारा पशुओं के कारण लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं, जिससे कई लोगों की जान जा रही है और अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं।
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शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पशु संरक्षण और नागरिकों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना सरकारों की जिम्मेदारी है। इसके लिए वैज्ञानिक, मानवीय और प्रभावी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, ताकि पशुओं की देखभाल भी हो सके और लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित रहे।
अदालत ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को स्थानीय निकायों के साथ मिलकर ऐसी नीतियां तैयार करनी चाहिए, जिनमें आवारा पशुओं के संरक्षण, पुनर्वास, पहचान, प्रबंधन और दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश हों। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में इस समस्या के समाधान के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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