दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग से सवाल किया कि वर्ष 2026 की मतदाता सूची में पहले से शामिल लोगों को भी फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है। अदालत ने आयोग को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
फॉर्म-6 का इस्तेमाल मुख्य रूप से पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। अदालत ने कहा कि पहले से पंजीकृत मतदाता यदि केवल अपना पता बदलते हैं, तो उन्हें फॉर्म-8 भरने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनसे यह घोषणा नहीं कराई जानी चाहिए कि वे पहले कभी मतदाता के रूप में पंजीकृत नहीं थे।
मसौदा मतदाता सूची से लगभग 43 लाख नाम हटाए गए हैं। इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिनके नाम सूची में नहीं मिले या जिन्हें दूसरे स्थान पर स्थानांतरित माना गया।
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समयसीमा बढ़ाने पर विचार करेगा आयोग
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह निर्धारित समयसीमा के बाद जमा किए गए फॉर्म स्वीकार करने पर विचार करेगा। जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की अंतिम तारीख भी बढ़ाई जा सकती है।
अदालत ने कहा कि काम के सिलसिले में एक-दो महीने बाहर रहने को मतदाता का स्थायी रूप से स्थान बदलना नहीं माना जाना चाहिए। उसने उन लोगों के लिए भी समाधान तलाशने को कहा, जो उसी जगह रह रहे हैं, लेकिन जिन्हें गणना प्रपत्र नहीं मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या समय पर फॉर्म जमा नहीं करने के कारण किसी व्यक्ति का मतदान का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है। अदालत ने कहा कि अंतिम मतदाता सूची तैयार होने तक केवल देर से आवेदन जमा करने के आधार पर उन्हें खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
प्रवासी कामगारों तक पहुंचे आयोग
अदालत ने कहा कि दिल्ली में फिलहाल चुनाव नजदीक नहीं हैं, इसलिए समयसीमा को लेकर अत्यधिक सख्ती करने के बजाय जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाया जा सकता है। उसने मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों और दिहाड़ी कामगारों तक खुद पहुंचने की जरूरत पर जोर दिया, क्योंकि काम के कारण उन्हें अक्सर स्थान बदलना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हटाए गए मतदाताओं की सूची सार्वजनिक करने का भी निर्देश दिया। सूची में नाम हटाने का कारण और जवाब नहीं देने के परिणाम सरल हिंदी तथा स्थानीय भाषाओं में बताए जाने चाहिए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि बिहार से जुड़े पुराने आदेश एसआईआर प्रक्रिया के सभी सवालों का समाधान नहीं करते। मतदाता सूची में तार्किक विसंगतियों की जांच की वैधता पर भी अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।
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