सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें तमिलनाडु सरकार की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया गया था, जिसके तहत इस्लाम धर्म अपनाने वाले एक व्यक्ति को आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद हिंदू सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा पिछड़ेपन का दर्जा दूसरी धार्मिक व्यवस्था में स्वतः स्थानांतरित नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की दो सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति को किसी अन्य धर्म के तहत पिछड़े वर्ग का दर्जा या आरक्षण का अधिकार नहीं मिल जाता। पीठ ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का भी उल्लेख किया। इस आदेश के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा सामान्यतः हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले निर्धारित समुदायों तक सीमित है।
रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति केवल अपने पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत सकारात्मक कार्रवाई का लाभ नहीं मांग सकता। अदालत ने यह भी कहा कि पुराने सामाजिक ढांचे में झेला गया पिछड़ापन अपने आप नए धर्म में पिछड़े वर्ग का दर्जा प्रदान नहीं करता।
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यह मामला समीर अहमद की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था और 2016 में उनके धर्म परिवर्तन की अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित हुई थी। बाद में उन्होंने आरक्षण का लाभ लेने के लिए स्वयं को ‘मुस्लिम लेब्बई’ समुदाय का सदस्य प्रमाणित करने वाला प्रमाणपत्र मांगा। तहसीलदार ने उनका अनुरोध अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया।
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी की पीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। शीर्ष अदालत के फैसले से हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहा।
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