सुप्रीम कोर्ट 5 जनवरी को दिल्ली दंगों से जुड़े एक अहम मामले में पूर्व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र नेता उमर ख़ालिद और अन्य आरोपियों की ज़मानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाने वाला है। यह मामला फरवरी 2020 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़ा है, जिनमें 53 लोगों की मौत हो गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
इन दंगों को लेकर आरोप है कि यह हिंसा नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी। अभियोजन पक्ष का दावा है कि उमर ख़ालिद और अन्य आरोपी इन दंगों के पीछे कथित “बड़ी साज़िश” के मास्टरमाइंड थे। इसी आधार पर उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया है।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिसंबर 2025 में इन ज़मानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आरोपियों ने दिल्ली हाई कोर्ट के 2 सितंबर 2025 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर दिया गया था।
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दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विरोध प्रदर्शन का “असीमित और निरंकुश अधिकार” संवैधानिक ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है और देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। हाई कोर्ट के इसी तर्क के खिलाफ आरोपियों ने शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था।
उमर ख़ालिद और अन्य आरोपियों की ज़मानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह न केवल इस मामले के आरोपियों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत ज़मानत के मानकों को लेकर भी दिशा तय कर सकता है। देशभर की निगाहें अब 5 जनवरी को आने वाले इस फैसले पर टिकी हुई हैं।
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