तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा है कि देश की शिक्षा व्यवस्था और शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रम में भारत की संस्कृति, परंपरा और मूल भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए। उनका कहना है कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार भी होनी चाहिए।
चेन्नई में बी. एस. अब्दुर रहमान क्रिसेंट इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन ‘एकता, सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका एवं विकसित भारत @ 2047’ का उद्घाटन करते हुए राज्यपाल ने यह बात कही।
राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा कि भारत की शिक्षा प्रणाली देश की सांस्कृतिक विरासत और मूल विचारधारा के अनुरूप होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सभी इसी मिट्टी, इसी देश और इसी संस्कृति से जुड़े हुए हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में भी यही सोच और मूल्य दिखाई देने चाहिए। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम और सिलेबस तैयार करते समय इस विषय पर व्यापक चर्चा की जानी चाहिए।
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राज्यपाल ने कहा कि भारत का भविष्य ऐसी शिक्षा पर निर्भर करेगा जो विद्यार्थियों में राष्ट्रीय मूल्यों के साथ-साथ नवाचार और नेतृत्व क्षमता भी विकसित करे। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों का उद्देश्य केवल नौकरी तलाशने वाले युवाओं को तैयार करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसे युवा तैयार किए जाने चाहिए जो दूसरों को रोजगार देने वाले उद्यमी बनें।
उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से उद्यमिता विकास प्रकोष्ठ (Entrepreneurship Development Cell) स्थापित करने का आग्रह किया। उनका मानना है कि इससे विद्यार्थियों में स्वरोजगार, नवाचार और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा।
राज्यपाल ने कहा कि ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। यदि शिक्षा में भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और उद्यमिता को समान महत्व दिया जाए, तो देश आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
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