जम्मू की विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अदालत ने पहलगाम आतंकी हमले के मामले में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के प्रमुख हाफिज सईद के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। यह कार्रवाई एनआईए की मांग पर की गई है। अदालत ने यह आदेश 8 जुलाई को पारित किया था, जिसके दो दिन बाद एनआईए ने हाफिज सईद के खिलाफ मामले में पूरक आरोपपत्र दाखिल किया था।
हाफिज सईद के भारत की अदालत में पेश होने की संभावना बेहद कम है। ऐसे में एनआईए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 356 के तहत उसके खिलाफ ‘ट्रायल इन एब्सेंटिया’ यानी आरोपी की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू करने की मांग कर सकती है। यह प्रावधान पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की जगह लागू किए गए नए आपराधिक कानूनों का हिस्सा है।
क्या होता है ट्रायल इन एब्सेंटिया?
‘ट्रायल इन एब्सेंटिया’ का अर्थ है कि यदि कोई आरोपी जानबूझकर न्यायिक प्रक्रिया से बच रहा है और उसे घोषित अपराधी (प्रोक्लेम्ड ऑफेंडर) घोषित किया जा चुका है, तो अदालत उसकी गैरमौजूदगी में भी मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ा सकती है।
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हालांकि, यह प्रावधान सभी मामलों में लागू नहीं होता। इसका इस्तेमाल केवल गंभीर अपराधों में किया जा सकता है, जिनमें सजा कम से कम 10 साल या उससे अधिक की कैद, उम्रकैद या मृत्युदंड हो सकती है।
हाफिज सईद पर क्या आरोप हैं?
एनआईए ने अपने पूरक आरोपपत्र में हाफिज सईद को पहलगाम आतंकी हमले की साजिश से जुड़े आरोपी के रूप में नामित किया है। एजेंसी ने उसे व्यक्तिगत रूप से और प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा तथा उसके सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) के प्रमुख के तौर पर आरोपी बनाया है।
एनआईए का कहना है कि हाफिज सईद पाकिस्तान में रहकर भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों को संचालित करता रहा है। वह 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के मुख्य साजिशकर्ताओं में भी शामिल रहा है।
क्यों जरूरी है यह प्रावधान?
ट्रायल इन एब्सेंटिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर अपराधों में शामिल आरोपी विदेश भागकर या छिपकर न्याय प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक रोक न सकें। इस व्यवस्था के तहत अदालत कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद आरोपी की अनुपस्थिति में भी सुनवाई जारी रख सकती है।
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