सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वंदे मातरम् के आधिकारिक गायन और इसके सभी छह अंतरों को गाने से जुड़े केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। साथ ही, कोर्ट ने संकेत दिया कि इस सवाल की भी जांच जरूरी है कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम् नहीं गाने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी या आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।
सुनवाई के दौरान इस बात पर चर्चा हुई कि सरकार किस हद तक वंदे मातरम् के गायन का स्वरूप निर्धारित कर सकती है और क्या इसे नहीं गाने पर किसी तरह की सजा का प्रावधान न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से इस चरण में नोटिस जारी नहीं करने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि इससे मामले को लेकर सनसनी फैल सकती है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि वंदे मातरम् के राष्ट्रगीत होने में कोई संदेह नहीं है।
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दो या छह अंतरे गाने के सवाल पर तुषार मेहता ने कहा कि इसका निर्णय सरकार को करना होगा। हालांकि, अदालत ने याचिका पर केंद्र से दो सप्ताह में जवाब मांगा और गायन से इनकार करने पर संभावित दंड के कानूनी पहलू की जांच की बात कही।
याचिकाकर्ता ने जनमत का मुद्दा उठाया
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि राष्ट्रगीत से संबंधित बदलाव करने से पहले जनता की राय ली जानी चाहिए थी। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह मुद्दा विचार योग्य है।
वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने दलील दी कि करीब 80 वर्षों में पहली बार लोगों पर ऐसी व्यवस्था लागू की जा रही है और इसमें दंड के प्रावधान भी जोड़े गए हैं। उन्होंने व्यापक सहमति की जरूरत बताई। वहीं, तुषार मेहता ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या इतने संकुचित तरीके से नहीं की जा सकती।
टीएम कृष्णा की याचिका
कर्नाटक संगीत के कलाकार टीएम कृष्णा ने भी केंद्र के उस सर्कुलर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन से संबंधित निर्देश हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि चार अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति भक्ति का स्पष्ट उल्लेख है और इनके अनिवार्य गायन को भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के संदर्भ में परखा जाना चाहिए। ये याचिकाकर्ता की दलीलें हैं, जिन पर अदालत केंद्र के जवाब के साथ विचार करेगी।
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