तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार ने मुल्लापेरियार बांध विवाद को लेकर केरल के कथित ‘अड़ियल रवैये’ की शिकायत सुप्रीम कोर्ट में की है। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि केरल के सहयोग नहीं करने के कारण बांध को मजबूत करने से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों में देरी हो रही है। इन कार्यों का संबंध बांध की संरचनात्मक सुरक्षा से है।
तमिलनाडु ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केरल ने बेबी बांध, मिट्टी के बांध और मुख्य बांध में ग्राउटिंग से जुड़े उपायों को समय पर पूरा करने में आवश्यक सहयोग नहीं किया। राज्य सरकार के अनुसार, इन सभी कार्यों को पूरा करना बांध की सुरक्षा और मजबूती के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
मुल्लापेरियार बांध का विवाद तमिलनाडु और केरल के बीच लंबे समय से चला आ रहा है। 7 मई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तमिलनाडु के पक्ष में फैसला सुनाया था। संविधान पीठ ने 131 वर्ष पुराने मुल्लापेरियार बांध को संरचनात्मक रूप से सुरक्षित माना था और तमिलनाडु को जलाशय में पानी का स्तर 136 फीट से बढ़ाकर 142 फीट करने की अनुमति दी थी।
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तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि वर्ष 2006 के एक फैसले में शीर्ष अदालत ने बांध को मजबूत करने के उपाय पूरे होने के बाद जलस्तर को अंततः 152 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दी थी।
तमिलनाडु सरकार का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के करीब 12 वर्ष पुराने फैसले के बावजूद बांध को मजबूत करने से जुड़े आवश्यक काम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सके हैं। सरकार ने केरल के रवैये को इन कार्यों में बाधा डालने वाला बताया है।
तमिलनाडु का कहना है कि बेबी बांध और मिट्टी के बांध को मजबूत करने के साथ मुख्य बांध में ग्राउटिंग का काम पूरा होना जल सुरक्षा के लिए जरूरी है। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट से मामले में हस्तक्षेप करने और पहले दिए गए आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने की मांग की है।
मुल्लापेरियार बांध पर दोनों राज्यों के बीच जलस्तर, रखरखाव और सुरक्षा को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। तमिलनाडु जहां बांध की मजबूती और जलस्तर बढ़ाने के अधिकार पर जोर देता रहा है, वहीं केरल बांध की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताएं लगातार उठाता रहा है।
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