भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की हालिया आर्मेनिया यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री सुरेन पापिक्यान और चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल एडवर्ड अस्र्यान के साथ महत्वपूर्ण बातचीत हुई। दोनों देशों ने सशस्त्र बलों के जनरल स्टाफ के बीच सीधे सहयोग के लिए नए ढांचे से जुड़े दस्तावेज पर भी हस्ताक्षर किए।
आर्मेनिया वर्ष 2020 से भारत के रक्षा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण ग्राहक बनकर उभरा है। उसने भारत के साथ करीब दो अरब डॉलर के रक्षा अनुबंध किए हैं। इनमें स्वाति रडार, पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और स्वदेशी आकाश वायु रक्षा प्रणाली शामिल हैं।
आर्मेनिया के लिए भारत केवल हथियारों का आपूर्तिकर्ता नहीं है। दोनों देशों के बीच प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और भविष्य में संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। आर्मेनिया में बड़ी संख्या में विशेषज्ञ मौजूद हैं, जिससे वह भविष्य में भारतीय रक्षा उत्पादों के लिए क्षेत्रीय निर्यात केंद्र बन सकता है।
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आर्मेनिया दक्षिण काकेशस में बेहद महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति रखता है। प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने देश को “क्रॉसरोड्स ऑफ पीस” यानी शांति के चौराहे के रूप में विकसित करने की योजना सामने रखी है। इसका उद्देश्य आर्मेनिया को व्यापार, परिवहन और संचार का प्रमुख केंद्र बनाना है।
भारत के लिए यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। चाबहार बंदरगाह से ईरान और आर्मेनिया होते हुए यूरोप तक पहुंच बनाने वाली अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा परियोजना भारत की यूरेशियाई संपर्क रणनीति का अहम हिस्सा है। आर्मेनिया के रास्ते जॉर्जिया के काला सागर बंदरगाहों तक पहुंच बनाई जा सकती है।
इसके अलावा अमेरिका भी आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच ट्रम्प रूट फॉर पीस एंड प्रॉस्पेरिटी परियोजना के जरिए संपर्क बढ़ाने में रुचि दिखा रहा है। प्रस्तावित मार्ग भविष्य में मध्य एशिया और यूरोप को जोड़ सकता है।
भारत के लिए आर्मेनिया में रक्षा सहयोग के अलावा व्यापार, विनिर्माण, शिक्षा, अंतरिक्ष, विज्ञान-तकनीक और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भी संभावनाएं हैं। वहां करीब 50 हजार भारतीय कामगार रह रहे हैं। ऐसे में आर्मेनिया भारत की रक्षा नीति के साथ-साथ व्यापक यूरेशियाई रणनीति में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
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