कर्नाटक में कथित वाल्मीकि निगम घोटाले को लेकर सियासत फिर गरमा गई है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की कैबिनेट में योजना एवं सांख्यिकी मंत्री बी. नागेंद्र ने पद संभालने के महज 25 दिन बाद इस्तीफा दे दिया। उन पर कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम में करीब 89.63 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं में शामिल होने के आरोप लगे हैं।
बी. नागेंद्र ने इन आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि वित्तीय अनियमितताओं में उनकी कोई भूमिका नहीं है और जरूरत पड़ने पर वह विधानसभा की सदस्यता भी छोड़ने को तैयार हैं। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी उनका बचाव करते हुए कहा कि नागेंद्र का इस मामले से कोई संबंध नहीं है और उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया।
भाजपा ने नागेंद्र के इस्तीफे को अपने आंदोलन की जीत बताया। विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने इसे कांग्रेस सरकार का “पहला विकेट” बताया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने आरोप लगाया कि नागेंद्र इस मामले में केवल “छोटी मछली” हैं और बड़े लोगों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
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क्या है वाल्मीकि घोटाला?
आरोप है कि वाल्मीकि निगम के करीब 187 करोड़ रुपये के फंड में से 89.63 करोड़ रुपये कथित तौर पर अवैध तरीके से दूसरी जगह भेजे गए। यह राशि अनुसूचित जनजाति समुदाय के कल्याण के लिए निर्धारित थी। जांच के दौरान दावा किया गया कि रकम फर्जी चेक, आरटीजीएस और ऑनलाइन लेनदेन के जरिए करीब 600 खातों में भेजी गई।
मामला निगम के लेखा अधीक्षक और व्हिसलब्लोअर चंद्रशेखरन पी. की आत्महत्या के बाद सामने आया। उनके सुसाइड नोट में कथित तौर पर अधिकारियों की ओर से अनधिकृत धन हस्तांतरण का दबाव बनाए जाने की बात कही गई थी।
इसके बाद विशेष जांच दल और केंद्रीय एजेंसियों ने जांच शुरू की। प्रवर्तन निदेशालय ने बी. नागेंद्र पर कथित धनशोधन और धन की हेराफेरी की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया। एजेंसी के अनुसार, कथित तौर पर हेराफेरी की गई रकम में से करीब 20 करोड़ रुपये का इस्तेमाल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक गतिविधियों और फंड जुटाने में किया गया था।
नागेंद्र इससे पहले भी 2024 में इस विवाद के बीच मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं। बाद में प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें गिरफ्तार किया था और उन्हें जमानत मिल गई थी।
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