मुंबई में लगभग दो दशकों बाद आयोजित ठाकरे भाइयों — राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे — की पहली संयुक्त रैली में एक मुद्दा सबसे ज्यादा उभरकर सामने आया। दोनों नेताओं ने बार-बार चेतावनी दी कि मुंबई को “गुजरात के हवाले” किए जाने की साजिश रची जा रही है। यह आरोप 15 जनवरी को होने वाले बीएमसी (मुंबई महानगरपालिका) चुनाव से ठीक पहले लगाया गया है, जिस पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
रैली को संबोधित करते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने कहा, “योजना हमेशा से मुंबई को महाराष्ट्र से छीनकर गुजरात से जोड़ने की रही है। इसे अंजाम देने के लिए पैसे का इस्तेमाल किया जा रहा है, जमीन खरीदी जा रही है, लोगों को यहां बसाया जा रहा है और अपने प्रतिनिधियों को जिताया जा रहा है।” उन्होंने इसे एक दीर्घकालिक रणनीति बताया और कहा कि जमीन पर कब्जा करना इसी योजना का हिस्सा है।
राज ठाकरे ने मराठी अस्मिता पर जोर देते हुए कहा कि “जमीन और भाषा ही आपकी पहचान है। अगर ये चली गईं, तो आपकी पहचान भी खत्म हो जाएगी।” इस बयान के जरिए उन्होंने मराठी समाज की आशंकाओं को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश की।
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शिवसेना का इतिहास रहा है कि वह समय-समय पर “बाहरी खतरे” के संदेश का इस्तेमाल मुंबई और महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता को मजबूत करने के लिए करती रही है। यह रणनीति खासकर शहरी राजनीति में प्रभावी रही है, जहां रोजगार, जमीन और संसाधनों को लेकर स्थानीय लोगों में असुरक्षा की भावना रहती है।
बीएमसी चुनाव से पहले राज और उद्धव ठाकरे का एक साथ मंच पर आना और पुराने मुद्दे को फिर से उठाना इस बात का संकेत है कि वे मराठी वोटों के एकीकरण की कोशिश कर रहे हैं। मुंबई की राजनीति में ‘मुंबई बनाम बाहरी’ की यह रेखा एक बार फिर खींची जा रही है, जो आने वाले दिनों में चुनावी माहौल को और तीखा बना सकती है।
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