भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इसमें मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान कथित वैधानिक उल्लंघनों को लेकर उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की मांग की गई है। याचिका में एसआईआर से जुड़े फैसलों और सॉफ्टवेयर में किए गए कथित बदलावों को भी चुनौती दी गई है।
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति या बहुमत की राय के बिना लिए गए। याचिकाकर्ता ने इन फैसलों को असंवैधानिक और अमान्य घोषित करने की मांग की है।
याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत सीईसी ज्ञानेश कुमार, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना और जिम्मेदार पाए जाने वाले अन्य अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कर अभियोजन शुरू करने की मांग की गई है। यह धारा मतदाता सूचियों की तैयारी, पुनरीक्षण या सुधार से संबंधित कुछ आधिकारिक कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान करती है।
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याचिका में फॉर्म-6 में कथित बदलाव को प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। फॉर्म-6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। याचिका के अनुसार, मई 2026 में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इसमें बदलाव पर आपत्ति जताई थी। बाद में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। याचिका का दावा है कि इसके बावजूद ईसीआईनेट पोर्टल पर फॉर्म-6 में पिछली एसआईआर मतदाता सूची में आवेदक या उसके रिश्तेदारों के नाम से संबंधित जानकारी मांगी गई।
याचिका में चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर से जुड़े मुद्दों पर कथित मतभेदों का भी उल्लेख किया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने कम से कम 14 मौकों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा है कि आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
याचिकाकर्ता ने एसआईआर के दौरान मतदाता सूचियों से कथित तौर पर हटाए गए करीब 13 करोड़ नामों की जांच के लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग की है। साथ ही ईसीआईनेट और ईआरओनेट से जुड़े सर्वर लॉग, डेटाबेस, संचार और मेटाडेटा सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है।
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