बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी को पेपरलेस और डिजिटल बनाने की तैयारी के बीच टैबलेट खरीदने का प्रस्ताव राजनीतिक विवाद में घिर गया है। बीएमसी में पार्षदों, प्रमुख समितियों के नेताओं और अधिकारियों के लिए 300 से अधिक टैबलेट खरीदने का प्रस्ताव है। इस पर करीब 5 से 6 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
बीएमसी का कहना है कि फिलहाल बैठकों के एजेंडे और जरूरी दस्तावेज पार्षदों तक पहुंचाने के लिए बड़ी मात्रा में कागज, प्रिंटिंग, कर्मचारियों, वाहनों, ड्राइवर और डीजल का इस्तेमाल होता है। डिजिटल व्यवस्था लागू होने से समय और खर्च दोनों बचाए जा सकते हैं।
हालांकि, शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे और कांग्रेस ने प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं। शिवसेना यूबीटी नेता आदित्य ठाकरे ने इसे फिजूलखर्ची बताते हुए कहा कि बीएमसी को मुंबईकरों की बुनियादी जरूरतों पर पैसा खर्च करना चाहिए। कांग्रेस का कहना है कि पार्षदों के पास पहले से स्मार्टफोन और निजी डिजिटल उपकरण मौजूद हैं, ऐसे में बीएमसी के पैसे से नए टैबलेट खरीदने की जरूरत नहीं है।
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कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि कई इलाकों में सड़क, नाले और अस्पतालों की स्थिति खराब है और विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन नहीं मिल रहा। पार्टी का कहना है कि टैबलेट के बजाय जनता से जुड़े विकास कार्यों पर पैसा खर्च किया जाना चाहिए।
वहीं, भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीति करार दिया है। बीएमसी में भाजपा के ग्रुप लीडर गणेश खनकर ने कहा कि पहले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली बीएमसी में भी पार्षदों के लिए लैपटॉप खरीदे गए थे। उन्होंने कहा कि बीएमसी को डिजिटल और पेपरलेस बनाने का विरोध नहीं होना चाहिए।
शिवसेना शिंदे गुट ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया है। उसके ग्रुप लीडर अमय घोले के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में एक पार्षद तक दस्तावेज पहुंचाने पर वाहन, ड्राइवर, कर्मचारी और डीजल समेत सालाना करीब एक लाख रुपये तक खर्च हो सकता है।
बीएमसी में 227 पार्षद हैं और उसका बजट 82 हजार करोड़ रुपये से अधिक है। प्रस्तावित टैबलेट की कीमत करीब डेढ़ लाख रुपये तक बताई जा रही है। हालांकि, प्रस्ताव अभी अंतिम नहीं हुआ है। प्रशासनिक प्रक्रिया और संबंधित समिति की मंजूरी के बाद ही इसे लागू किया जा सकेगा।
अब बहस इस बात पर है कि टैबलेट खरीद से बीएमसी वास्तव में डिजिटल और किफायती बनेगी या यह मुंबईकरों के पैसे की अनावश्यक खर्ची साबित होगी।
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