परिसीमन विधेयक (डिलिमिटेशन बिल) एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। चर्चाएं हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले इस विधेयक को संसद से पारित कराने का नया प्रयास कर सकती है। असम और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हालिया चुनावी सफलताओं के बाद इस विषय पर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय परिसीमन विधेयक को दोबारा संसद में पेश करने की तैयारी कर रहा है। सरकार की योजना परिसीमन विधेयक के साथ-साथ “एक राष्ट्र, एक चुनाव” विधेयक को भी 2029 के आम चुनाव से पहले मंजूरी दिलाने की है।
पिछली बार जब यह विधेयक लोकसभा में लाया गया था, तब इसके पारित होने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी। यानी कम से कम 362 सांसदों का समर्थन जरूरी था। हालांकि सरकार को केवल 298 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। आवश्यक संख्या नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका था।
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अब राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (डीएमके) के रिश्तों में दूरी आने की चर्चा है। ऐसे में केंद्र सरकार डीएमके के साथ संवाद बढ़ाकर व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश कर सकती है।
वहीं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर संभावित राजनीतिक बदलावों पर भी नजर रखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी के कुछ सांसद अलग राह अपनाते हैं, तो संसद में संख्या संतुलन बदल सकता है और सरकार के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना आसान हो सकता है।
इस बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा है कि इस मुद्दे पर सरकार ने अभी तक विपक्ष से कोई औपचारिक बातचीत नहीं की है। उन्होंने कहा कि लोकसभा में जनसंख्या के उचित प्रतिनिधित्व और राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यापक चर्चा आवश्यक है।
परिसीमन का मुद्दा राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन से जुड़ा होने के कारण बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में इस विधेयक की वापसी पर देशभर में व्यापक राजनीतिक बहस छिड़ने की संभावना है।
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