आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने डिजिटल लत (डिजिटल एडिक्शन) के बढ़ते खतरे पर गंभीर चिंता जताते हुए इससे निपटने के लिए व्यापक और ठोस हस्तक्षेपों की आवश्यकता पर जोर दिया है। संसद में पेश किए गए सर्वेक्षण में कहा गया कि डिजिटल लत युवाओं और वयस्कों दोनों की शैक्षणिक प्रदर्शन क्षमता, कार्यस्थल की उत्पादकता और मानसिक स्वास्थ्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही है।
सर्वेक्षण रिपोर्ट में डिजिटल लत को एक उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बताया गया है, जिस पर दुनिया के कई देशों—जैसे ऑस्ट्रेलिया, चीन, दक्षिण कोरिया—ने नियामक, उपचारात्मक और शैक्षिक उपाय अपनाए हैं। रिपोर्ट में भारत में भी विभिन्न सरकारी विभागों के मौजूदा प्रयासों के अलावा अतिरिक्त हस्तक्षेपों की सिफारिश की गई है।
सर्वेक्षण के अनुसार 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में मोबाइल और इंटरनेट की लगभग सार्वभौमिक पहुंच हो चुकी है। ऐसे में अब समस्या पहुंच की नहीं, बल्कि व्यवहारिक स्वास्थ्य से जुड़ी है—जैसे डिजिटल लत, कंटेंट की गुणवत्ता, मानसिक भलाई और डिजिटल स्वच्छता।
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रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में डिजिटल लत से निपटने की सबसे बड़ी चुनौती इसके प्रसार और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव से जुड़ा व्यापक राष्ट्रीय डेटा का अभाव है। इससे लक्षित नीतियां बनाने, संसाधन आवंटन और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य रणनीतियों में डिजिटल वेलनेस को शामिल करने में कठिनाई आती है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने उम्मीद जताई कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा निम्महैंस (NIMHANS) के नेतृत्व में किया जाने वाला दूसरा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) इस दिशा में ठोस और व्यावहारिक आंकड़े उपलब्ध कराएगा।
सर्वेक्षण में डिजिटल लत के आकलन के लिए प्रमुख संकेतकों—जैसे स्क्रीन टाइम, नींद की गुणवत्ता, तनाव स्तर, पढ़ाई व कामकाज की उत्पादकता, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ठगी और रियल मनी गेमिंग—को शामिल करने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि अत्यधिक और बाध्यकारी डिजिटल उपयोग से पढ़ाई का नुकसान, उत्पादकता में गिरावट, स्वास्थ्य पर बोझ और जोखिमपूर्ण ऑनलाइन व्यवहारों से वित्तीय नुकसान जैसे सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं।
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