पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर सोमवार 9 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका भी शामिल है।
ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” श्रेणी के तहत करीब 70 लाख लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह पूरी प्रक्रिया बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश है। उन्होंने चुनाव आयोग की वेबसाइट के स्क्रीनशॉट अदालत में दिखाते हुए कहा कि निर्देशों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास आधार या एडमिट कार्ड जैसे दस्तावेज भी हों, तब भी नाम हटाने की बात कही जा रही है।
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि सामने आई विसंगतियां “आइसबर्ग की सिर्फ नोक” हैं और जांच में और भी कई गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं। वहीं राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि मतदाता सूची में नाम पर आपत्ति करने वाले लोगों की पहचान सार्वजनिक नहीं की जा रही है और उन्हें सामने आकर अपने आरोप स्पष्ट करने चाहिए।
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इस बीच, कवि जॉय गोस्वामी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत से अपील की कि अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी को प्रकाशित न की जाए। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर निर्णय नहीं ले सकते।
इससे पहले 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। ममता बनर्जी ने अदालत से “लोकतंत्र बचाने” के लिए हस्तक्षेप की मांग की थी और आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है। अब इस मामले पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।
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