वरिष्ठ कवि, पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने हाल ही में अपने लंबे समय से सहयोगी रहे संगीतकार ए.आर. रहमान के उस बयान से असहमति जताई है, जिसमें रहमान ने कहा था कि पिछले आठ वर्षों में हिंदी फिल्म उद्योग अधिक सांप्रदायिक हो गया है। जावेद अख्तर का कहना है कि बॉलीवुड कभी भी किसी एक धर्म विशेष से संचालित नहीं रहा और यहां हमेशा काम के लिए सबसे योग्य व्यक्ति को चुना गया है।
जावेद अख्तर के मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री मूल रूप से धर्म-निरपेक्ष रही है और कलाकारों या तकनीशियनों को उनकी आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी प्रतिभा के आधार पर अवसर दिए जाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई यह मानता है कि आज बॉलीवुड पहले से ज्यादा सांप्रदायिक हो गया है, तो वह इस धारणा से सहमत नहीं हैं।
अख्तर ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि एक समय उन्हें नास्तिक होने का दावा करने पर “झूठा” तक कहा गया था। लोगों को यह समझ नहीं आता था कि जो व्यक्ति खुद को नास्तिक कहता है, वह भक्ति गीत कैसे लिख सकता है।
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उन्होंने याद दिलाया कि उन्होंने आशुतोष गोवारीकर की फिल्मों ‘लगान’ (2001) का लोकप्रिय भक्ति गीत “ओ पालनहारे” और ‘स्वदेस’ (2004) का “पल पल है भारी” जैसे गीत लिखे हैं। ‘पल पल है भारी’ फिल्म में रामलीला के दृश्य पर आधारित था और इसे सीता के दृष्टिकोण से लिखा गया था।
जावेद अख्तर ने साफ शब्दों में कहा कि रचनात्मक अभिव्यक्ति का धर्म या आस्था से सीधा संबंध नहीं होता। एक लेखक या गीतकार किसी भी विषय पर लिख सकता है, चाहे वह भक्ति हो, प्रेम हो या सामाजिक मुद्दे। उन्होंने यह भी कहा कि वे चाहें तो राम आरती भी लिख सकते हैं, क्योंकि कला की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती।
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