म्यांमार में 2021 में सैन्य तख्तापलट के ज़रिए सत्ता हथियाने वाले जनरल मिन आंग ह्लाइंग, जो अब देश के राष्ट्रपति के रूप में कार्यरत हैं, को क्षेत्रीय कूटनीति में धीरे-धीरे स्वीकृति मिलती दिख रही है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान (एएसईएएन) के कई सदस्य देशों के नेता अब उनके साथ संपर्क बढ़ाते नज़र आ रहे हैं, जबकि म्यांमार में गृहयुद्ध अब भी थमा नहीं है। आलोचकों का कहना है कि आसियान नेताओं द्वारा मिन आंग ह्लाइंग को गले लगाना म्यांमार की सैन्य सरकार को और हौसला देने वाला कदम है। उनका आरोप है कि सेना अभी भी देश के विभिन्न हिस्सों में आम नागरिकों पर हवाई हमले और बमबारी कर रही है, जिसमें बड़ी संख्या में जनहानि हो रही है। तख्तापलट के बाद से म्यांमार में सेना और लोकतंत्र समर्थक सशस्त्र समूहों तथा जातीय सशस्त्र संगठनों के बीच संघर्ष लगातार जारी है, जिसने देश को गहरे मानवीय संकट में धकेल दिया है। तख्तापलट के तुरंत बाद आसियान देशों ने म्यांमार की सैन्य सरकार से दूरी बनाई थी और संगठन ने सैन्य नेताओं को अपने शिखर सम्मेलनों में आमंत्रित करना बंद कर दिया था। उस समय आसियान ने पांच-सूत्री सहमति भी बनाई थी, जिसमें हिंसा तत्काल समाप्त करने, सभी पक्षों के बीच संवाद शुरू करने और मानवीय सहायता पहुंचाने जैसी बातें शामिल थीं। हालांकि आलोचकों के अनुसार यह सहमति अब तक काफी हद तक निष्प्रभावी साबित हुई है, क्योंकि म्यांमार की सेना ने इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई। अब स्थिति में बदलाव आता दिख रहा है, जहां आसियान के कुछ सदस्य देशों के नेता मिन आंग ह्लाइंग के साथ प्रत्यक्ष बातचीत और राजनयिक संपर्क बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब म्यांमार में लोकतंत्र समर्थक ताकतों और जातीय विद्रोही समूहों का प्रतिरोध अब भी मजबूत बना हुआ है, और देश के बड़े हिस्से पर सेना का नियंत्रण कमजोर पड़ चुका है। मानवाधिकार संगठनों और पर्यवेक्षकों ने चेतावनी दी है कि क्षेत्रीय नेताओं का यह रुख म्यांमार की सेना को यह संदेश दे सकता है कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं किया जाएगा, भले ही वह नागरिकों के खिलाफ हिंसा जारी रखे। उनका कहना है कि इस तरह की स्वीकृति से म्यांमार में संकट के शांतिपूर्ण समाधान की संभावनाएं और कमजोर हो सकती हैं, तथा सैन्य नेतृत्व पर जवाबदेही तय करने का दबाव घट सकता है। म्यांमार का संकट अब भी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, और आसियान के भीतर इस मुद्दे पर रणनीति को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।
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