पिछले महीने मुंबई के एक पुलिस स्टेशन में आठ लोगों का एक शांत समूह पहुंचा। उनकी खामोशी ने ही सबसे पहले सब-इंस्पेक्टर (एसआई) गणेश अवटे का ध्यान खींचा। कुछ ही देर में उन्हें अहसास हुआ कि उनके सामने लगाए गए आरोप कितने गंभीर और संवेदनशील हैं।
यह मुंबई के मालाड इलाके के एक पुलिस स्टेशन में शनिवार की एक सामान्य दोपहर थी। प्रवेश द्वार से दूसरा कमरा फरियादियों से भरा हुआ था। हर कोई अपनी शिकायत लेकर पुलिस अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था। कमरे में शोरगुल और बहस का माहौल था।
इसी भीड़ में 7-8 लोगों का एक समूह अलग नजर आ रहा था। एक महिला अपने माता-पिता और भाई के साथ ससुराल वालों द्वारा कथित उत्पीड़न की शिकायत लेकर आई थी। संयोग से उसका पति और ससुराल पक्ष के लोग भी वहां मौजूद थे। दोनों पक्षों के बीच जोरदार बहस हो रही थी, जिसकी आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी।
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ड्यूटी पर तैनात 35 वर्षीय सब-इंस्पेक्टर गणेश अवटे ने हस्तक्षेप किया और दोनों पक्षों को शांत कराने की कोशिश की। वह शिकायत सुनने और विवाद सुलझाने में व्यस्त थे।
करीब दोपहर 3 बजे, अवटे कुछ देर के लिए उस हंगामे से अलग हुए। उन्होंने कमरे के बाहर नजर डाली और तभी उन्हें कुछ असामान्य दिखाई दिया। पुलिस स्टेशन के बाहर एक महिला अपने परिवार के सदस्यों के साथ खामोशी से बैठी थी। न कोई शिकायत, न कोई बहस, न ही कोई शब्द।
जब अवटे ने उनसे बातचीत शुरू की, तो पता चला कि महिला बोल और सुन नहीं सकती। इसके बाद जो सामने आया, वह चौंकाने वाला था। महिला ने इशारों के जरिए तीन घंटे तक अपने जीवन के 16 सालों का दर्द बयां किया। उसने 2009 में हुए बलात्कार की पूरी घटना, उसके बाद झेली गई यातनाएं और लंबे समय तक दबा रह गया न्याय का संघर्ष इशारों में समझाया।
महिला की इस साहसिक पहल और पुलिस की संवेदनशीलता के चलते 2009 के मुंबई रेप केस की गुत्थी सुलझ पाई। खामोशी में छिपा सच आखिरकार सामने आ गया।
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