पंजाब के अमृतसर स्थित श्री अकाल तख्त के समक्ष सोमवार को पंजाब कैबिनेट के सिख मंत्री और सभी सिख विधायक पेश हुए। यह पेशी एंटी-सैक्रिलेज कानून को लेकर दी गई समन के बाद हुई, जिसमें उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया था। हालांकि मुख्यमंत्री भगवंत मान को इस मामले में तलब नहीं किया गया, जबकि गैर-सिख मंत्रियों से लिखित रूप में अपनी राय देने को कहा गया।
श्री अकाल तख्त सिख धर्म का सर्वोच्च लौकिक (टेम्पोरल) अधिकार केंद्र माना जाता है, जो श्री हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर), अमृतसर के सामने स्थित है। “तख्त” शब्द फारसी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ “सत्ता का सिंहासन” होता है। इसे सिख समुदाय का सर्वोच्च धार्मिक-राजनीतिक केंद्र माना जाता है।
इसकी स्थापना 1606 में छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने की थी। अकाल तख्त का सिंहासन मुगलों की सत्ता को चुनौती देने के प्रतीक के रूप में उनकी निर्धारित प्रोटोकॉल से तीन गुना ऊंचा बनाया गया था, जो स्वतंत्रता और संप्रभुता का प्रतीक है।
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अकाल तख्त का नेतृत्व जत्थेदार करता है, जो किसी भी सिख को तलब करने और आदेश जारी करने का अधिकार रखता है। वह धार्मिक आदेश जारी कर सकता है, किसी को “तन्खैया” घोषित कर सकता है और समुदाय के लिए दिशा-निर्देश तय करता है।
यह संस्था किसी भी व्यक्ति को कानूनी रूप से दंड या जेल की सजा नहीं दे सकती, लेकिन धार्मिक दंड जैसे सेवा (जैसे जूते साफ करना या बर्तन धोना) या सामाजिक बहिष्कार का आदेश दे सकती है।
पंजाब की राजनीति में अकाल तख्त की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि यह सिख समुदाय की भावनाओं और परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। राजनीतिक दल अक्सर इसके निर्णयों को गंभीरता से लेते हैं क्योंकि इसका सामाजिक और धार्मिक प्रभाव व्यापक होता है।
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