असम के शिवसागर जिले के दिकचु क्षेत्र से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां ध्रुवजित हाटीबरुआ ने पारंपरिक सरकारी नौकरी की दौड़ से हटकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। उच्च शिक्षित होने के बावजूद उन्होंने नौकरी के बजाय कृषि आधारित उद्यमिता को चुना और आज वे एरी रेशम और मशरूम खेती के जरिए अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं।
ध्रुवजित ने शुरुआत छोटे स्तर पर एरी रेशम उत्पादन से की थी। यह असम की पारंपरिक रेशम उद्योग का हिस्सा है, जिसे स्थानीय रूप से “एरी सिल्क” कहा जाता है। धीरे-धीरे उन्होंने आधुनिक तकनीकों को अपनाया और उत्पादन क्षमता को बढ़ाया। इसके साथ ही उन्होंने मशरूम खेती की शुरुआत की, जो कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय साबित हुआ।
उनकी मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण आज उनका कृषि उद्यम कई स्थानीय किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है। वे न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बने हैं बल्कि आसपास के युवाओं को भी स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
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ध्रुवजित का मानना है कि कृषि को यदि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक तरीके से अपनाया जाए तो यह किसी भी नौकरी से अधिक स्थिर और लाभकारी हो सकता है। उन्होंने स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए अपने व्यवसाय को विस्तार दिया और अब वे सालाना लाखों रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं।
उनकी यह सफलता की कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर सही योजना, मेहनत और नवाचार हो तो ग्रामीण भारत में भी बड़े स्तर पर उद्यमिता विकसित की जा सकती है। आज वे असम के उन युवाओं में गिने जाते हैं जो आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ा रहे हैं।
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