अमेरिका के वित्त मंत्री (यू.एस. ट्रेज़री सेक्रेटरी) स्कॉट बेसेंट ने बुधवार (28 जनवरी 2026) को यूरोप द्वारा भारत के साथ एक बड़े व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के फैसले पर निराशा जताई। उन्होंने कहा कि इस समझौते से यह स्पष्ट होता है कि यूरोप ने यूक्रेनी जनता के हितों की तुलना में व्यापार को प्राथमिकता दी है।
बेसेंट ने कहा कि यूरोप भारत में प्रतिबंधित रूसी तेल से बने परिष्कृत उत्पादों की खरीद करता रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यूरोपीय संघ अमेरिका की तरह भारत पर ऊंचे टैरिफ लगाने के लिए इसलिए तैयार नहीं था, क्योंकि वह भारत के साथ अलग से व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा था।
यूरोपीय संघ ने मंगलवार (27 जनवरी 2026) को भारत के साथ लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया। इस समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच व्यापार को बढ़ाना और वैश्विक व्यापार तनाव के बीच अमेरिका पर निर्भरता कम करना है। यूरोपीय संघ के अनुसार, इस करार के तहत 96.6 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क समाप्त या कम किया जाएगा, जिससे 2032 तक भारत को यूरोपीय निर्यात दोगुना हो सकता है और यूरोपीय कंपनियों को लगभग 4 अरब यूरो की बचत होगी।
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जब बेसेंट से पूछा गया कि क्या अमेरिका को बाहर रखकर किए गए ऐसे समझौते अमेरिका के लिए खतरा बन सकते हैं, तो उन्होंने कहा कि देशों को अपने हित में निर्णय लेने का अधिकार है, लेकिन यूरोप का रवैया उन्हें बेहद निराशाजनक लगा।
उन्होंने यह भी कहा कि इसी कारण यूरोपीय संघ ने पिछले साल भारत पर 25 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लगाने के फैसले का समर्थन नहीं किया था, जिसका उद्देश्य भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद को कम करना था।
इस बीच, अमेरिका दक्षिण कोरिया से भी पिछले साल हुए व्यापार समझौते की पुष्टि (रैटीफिकेशन) की मांग कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दक्षिण कोरिया से आयात पर शुल्क 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया था। बेसेंट ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि इससे प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
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